शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१०६-सब के dilo me एक saar

१-"सबके दिलो मे एक् सार "
गुलाब की शाख मे खिलने से
पहले जड़ ,तना ,शाखाओं ... से होते हुवे
हथेलियों की तरह ,सारी पत्तियों का
आशीर्वाद भी तो लेना है मुझे
आखिर हू तो मै तुमसा मिटटी मे उभरा जल-तरंग ही
रंगो से सजा एक् पल
ही हर चेहरे मे उगे जैसे ,दो नयन सजल होऊ
आँख मुदने से पहले सब देख लेना है मुझे
हो सकता है - तुम्हारे जुड़े मे सजकर और खिल जाऊ या ...
किसी के हाथो सप्रेम उपहार सा मिल जाऊ
या
सीधे तुम्हारे हाथो ही तोडा जाऊ
२-अंत तो मेरा होना ही है
हे संध्या ....स्वागत मे तेरे कदमो पर पंखुरियों सा ,बिछना ही है
लेकीन ....
उससे पूर्व
और लाल ,पीला ,गुलाबी ,हरा ...या सतरंगी होना है मुझे
मुझे अपनी महक की सीमा मे असीमित होना है
दुश्मनों को भी दोस्तों सा घेर लेना है
पैसा या प्यार
पैसे से प्यार नही मिलेगा
तो क्या प्यार से पैसा मिल जायेगा ॥?
मै कैसे समझाऊं
तुम तो मुझे फूल समझते हो
वह
अपाहिज एक् पैर वाला ॥
भिखारी एक् आँख वाला
पुजारी केवल एक् धर्म वाला
वह वेश्या जो करती है केवल देह से तपस्या
इस प्यार मे सब शामिल है
मेरी महक से ,झोपडी क्या महल
प्रसन्नता सबको हासिल है
शरीर से छुवो या पैसे से ---मै रंग हू
आत्मा मे भरो या प्यार की खुली पारदर्शी - शीशी मे
3-मै गुलाब के फूलो की महक हू इस पार -उस पार आर -पार सब जगह
,सबकी सांसो मे -"एक् सार"{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: