सोमवार, 6 अप्रैल 2009

१११-सर्वश्रेष्ठ है मनुष्य

२2-वृक्ष के रंग
या
रंगों से
सरोबार
हर दृश्य
क्योकि -मै ,तुम ,हम ,वृक्ष .....
हम सब है
अक्षरों से अंकित
केवल एक् सजीव पृष्ठ
यहाँ
पर
सच
खुले आम प्रस्तुत है
इस्त्री हो या पुरुष
शब्द हो या व्यक्ति
रंग हो या अभियक्ति
लौट आओ -
सब समीप
बहुत समीप










































































प्रेम या भूख
दोनों मे दर्द का -एक् सामान रूप
कला है ठीक उसके
अनुरूप
एक् गीत
बिखरे हुवे रंगों को समेटो .....
किसी अनाथ
का कौन है नाथ ...मै या तुम ..
किसी को लाठी पकडा दो ,किसी को कम्बल ओढ़ा दो
किसी के लीये पुस्तक ला दो
और अब -
तो
छोटा हो चूका है विश्व

कोई टिप्पणी नहीं: