शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१०७-शाश्वत अभिव्यक्ति

हर पुरूष के भीतर
अदृश्य -स्त्री की आश सा
हर स्त्री के भीतर
निराकार पुरूष की चाह सा
आदिम -मगर प्रेम की
शाश्वत -अभिव्यक्ति
सदैव
आँखों से बहती पीडा -मय
अश्रु -धारा सी अविरल
और
इसीलिए स्व-एकांत मे
हुवा है -करुना का
का उदार अवतरण
विरह -ज्योति मे जल ,जल ,
इसलिए नित्य करता
भोर से संध्या तक -छाया सा .....
सत्य -चेतना का सजीव अनुकरण
धुप के संग चल ,चल
नही मिलता वह -डूमर की टहनियों से लापता
अदृश्य फूल मे
निहारता उसे बसमै
झरी पंखुरियों सा -पुरे हुवे सिंदूर मे
उगे हरे कच्चे गेंहू -ओ ,पर
bathi chidiyo के sur me
jnm -mriyu ke bich
bahate man jal
me duba ho jaise
vah
dhudata use
baith-kar is dagmagate
jivan -pul me {kishor kumar khorendra }

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