शनिवार, 4 अप्रैल 2009

११०-बात पते की

बात पते की
कहते क्यो नही
सीधे सीधे
चढते रहते ही सीढिया
इस मन्दिर की ,उस मन्दिर की
बजते -बजते
क्या थकी नही अब तक
स्वर्ण घंटिया
पढ़ते रहते हो किताबे
इस किताब को ,उस किताब को
अब तक
ख़त्म नही हुवी क्या
वही दुहराती हुवी सी कहानिया
लिखते रहते हो कविताएं
इस कविता को ,उस कविता को
और कितनी लम्बी हैं
मन की अव्यक्त गलिया
मिलते रहते हो
इस व्यक्ति से ,उस व्यक्ति से
कितनी मधुर है मानव तन
की ग्रन्थिया
चलते रहते हो अनेक पग -डंडिया
इस पग -डंडी पर ,उस पगदंडी पर
मंजिल के पास है
क्या है
ढेरो खुबिया
लेते रहते हो अनेक जनम
पूर्व जन्मो से इस जन्म तक
थकी नही
क्या
बनती -बिगडती आकृतिया
बात पते की -
कहता हू
sunane को
क्या हो तुम आतुर -
देश ,काल ,आकाश,
सब अन्नत है
और कामनाये भी
इसलिए अंत -हिन्
न चाहो तो नही कोई भीड़
एकांत मे शांत सी
मन की नीरव होती
चेतना -मयी झील
anythaa vasnaaye - फैली दिखती
दूर दूर तक
मिलो -मील {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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