बुधवार, 22 अप्रैल 2009

१२६-सागौन वृक्षो के पास

२-दोनों हाथ पडे रहते है
दफ्तर मे फाईलो के पास
किसी की आँखों के आईने ने
मेरा चेहरा चुरा लिया है
गाँव से आए पिता
के पांवो को छूने से
कैसे मना कर देगा मेरा कोट ॥?
पडोसी को शायद मालूम नही
की
गुडहल के फूल की
पंखुरीयो
सा .....
मै ही गिर जाया करता हू
अक्सर
अपने आँगन से
उसके आँगन -द्वार
मै ठहरा हूवा शरीर हू
इसका अहसास कभी नही होता मुझे
लगता है मेरा कद मेरी देह से बडा है
किसी डिब्बे मे बैठा हवा
मेरा शरीर भागता चला जाता है ...
रेलगाडी के साथ
और .....
.मै .........
छूट जाया करता हू
प्राय:
किसी न किसी
जंगल मे उगे हुवे
हजारो -सागौन वृक्षो के पास
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }