गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

१२९-महानदी के उदगम सिहावा मे

२-महानदी के
इस
उदगम बिन्दु पर
तितर -बितर
कांच के छोटे -छोटे
टुकडो जैसे -
बिखरी बूंदों मे
स्व -समाहीत है .....
लम्बी यात्रा के लिए
भरपूर
उछलता हूवा
आत्म -विशवास
गाँवो का दर्द
शहरो का हर्ष
समुद्र तक पहुचने
के लिए
पहले मै
पहले मै
का प्रारम्भिक
बूंदों का ....
तीव्र -संघर्ष
उछल -कूद
परस्पर -व्यवधान
मै शीश नवाता हू

लगता है एक पल को --
अरब सागर से इस उदगम तक
जैसे
लौट आयी है
महानदी
श्रृंगी -रीशी को
पुन:-करने प्रणाम
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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