शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१११-रोज टिमटिमाता हू

रोज टिमटिमाता हू
सितारों सा
झांकता है
अपना चेहरा
चाँद
जिसमे
वह धरा -जल हो गया हू
इस चित्र मे
वन ,पर्वत ,निर्झर , -
सब है
मगर तुम
नही .....
तो
मै तन्हा -पल हो गया हू
सुब्हह ,दो-पहर ,शाम
या रात -भर
हर समय
अंधेरो को पता नही ,उजालो का ......
उजाले को पता नही ,अंधेरो का ....
यह जान कर
कितना ...सहमा -मन
हो गया हू
देखो तो सही
किसी ओर
पकडो तो मुझे
किसी छोर
तुम मुझसे दूर हो
किस मोड़ ?
लेकिन
आईने से बाहर
न मेरा - न तुम्हारा
कहाँ ,कब चला है
कोई जोर
यह जान कर
मै
यही पर
ठहरा -पल
हो गया हू
नीड़ मे तुम ,जागरण मे तुम
इस स्वप्न -दर्शन से बाहर
आकर
तुम्हारे बिना
निर्जन -वन हो गया हू
मै
धरा -जल

tanha -पल
सहमा -मन
ठहरा -thal
इस तरह
निर्जन -van मे
vichrtaa
ekaant भ्रमण -हो गया हू {kishor kumar khorendra }

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