गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

१२८-आराम से

२- उस तरह
अचानक नही
ह्रदय -गति
रुकने जैसे-
बिन
बुलाए मेहमान की तरह
मृत्यु का आ धमकना ........
जीते जी क्या..?, मरने भी मे .....
मजा नही आ पाया था उसे
अब उसने सोचा है
मै मरुंगा तो
मृत्यु को ....
उसे
महसूस करते हुवे ..धीरे -धीरे
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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