मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

१२४-दुःख;का निवारण भी है

१२४-मिला दो पहले
रेत सी
महीन
भावनाओं मे
अपने सच्चे इरादों को
सीमेंट की तरह
और
उठा ले आओ
अच्छे शब्दों की तरह
पक्की ईटो को
रेत
सीमेंट
और ईटो से
शायद
इस बार
एक् मजबूत कविता बन जाये
हर बार
टूट कर गिरे पत्तो से
गौरेया से दुबके कोने से
झरी पंखुरियों की रंगोली से
जूतों से बचकर ,भाग नही
पायी चिटीयों से
---महगाई मे घर
बनाने की तरह
कठीन हो गया है
कविता लिखना
रेत और सीमेंट मे
दर्द
को
पानी की तरह
मिलाना भी तो बचा है
लेकीन दर्द कहां से लाऊ
किसान का बैल हो
या
गरीब की गईया
सबकी आँखों का कुवा
सुख चूका है
आंसू पुरे बह गये
लोग कहते है
सागर मे
फ़ीर भी -जल कुछ कम हो गये ....?
इस कवीता के मेरे पक्के घर मे
क्या
चमकदार
लोग ही आ पायेंगे
धोती
बनियान
नंगे -पाँव
एक् भी ग्रामीण
भीतर प्रवेश न कर पायेंगे ...?
कहते है दुःख: है
दुःख का निवारण भी है
मै कहता हू
दुःख -समाज की कुप्रथाओं का परिणाम है
क्या
आप
मै
हम
मिलकर
सागर से नमक अलग कर
जल को
सारे
कब तक
मीठा कर पायेंगे ..?
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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