रविवार, 5 अप्रैल 2009

११२-चाँद पर जरुर जाना

"चाँद पार जरुर जाना "

नही कहता





















































































































































































































































































































































































































































































मेरी या उसकी पढो कविता मै कहता हू पढो केवल कविता कालिदास से टैगोर तक मुक्ति बोध से अब -तक सब कविताएं सब कहानियां सभी उपन्यास सारे नाटक सुन लेना संगीत और देख लेना सारे चरित्र -सचित्र चाँद पर जाने या फ़ीर पहुचकर रहने से पहले रच लेना मन मे एक् सु -सभ्यता इस धरती पार साकार न कर पाए जो सपना चूता राह गया हो किसी कारन कोई अपना साथ उन्हें भी ले जाना सब अपाहिज सब अंधे सब अनाथ और मन के रंगो से अपरिचित इन सबको चाँद दिखाना उनके लीये एक् बस्ती बसाना फ़ीर प्रेम का एक् दिया जलाना तब -अपने लीये एक् घर वहां बनाना शर्त ...?मंजूर हो तो चाँद पार जरुर जाना ।{किशोर कुमार खोरेन्द्र }























































































































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