शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

१३२-अपना गाँव

१-बरसो बाद
लौटा हू
शहर से
अपने गाँव मे
२-नयी पक्की सड़क ने
मुझे घूर कर देखा
बिजली के खम्बो ने
ने
जैसे
रोक कर
पता मेरा पूछा
नयी बनी नहर
के पानी ने
मुझे चलने से रोका
दूकान मे
सजे नये सामानों ने
गमछा नही खरीदने पर
एतराज
अपना जताया
३-विकास अच्छा हूवा
परन्तु
वो वृक्ष
वो वृद्ध ......?
पीपल
बरगद
नीम
वे सब
अदृश्य हो
गये है
तालाब के पानी का
अब
मंदीर की सीढियों तक
बहाव नही रहा
मेरे घर के सामने का
ईमली
का वह पेड़ भी
धराशायी पडा है
मेरी यादो मे बसा
मेरा वह गाँव
बदल गया है
पर
मेरे लिए तो
खो गया है
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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