सोमवार, 13 अप्रैल 2009

११७-मन की आंतरिक यात्रा

२-चाहे वह
सपना या जागरण
हर समय
एकांत के
अंतहीन घेरे से बाहर
कोई न कोई
हरा -भरा वृक्ष
या
अपना सा लगता व्यक्ती
मेरी तरफ दौड़ता
हुवा -
मेर पास आना चाहता है
पर ठीक उसके छूते ही
यथार्थ हो
या
सपना
दोनों मे ही मुझे घेरा हुवा
वह
पार -दर्शी
बुलबुला फुट जाया करता है
जैसे ही मै
संतुष्टी के साँसों को
लेना चाहता हू
न यथार्थ रहता न सपना
बस् रह जाता हू
नवजात शिशु सा
फ़िर इस जग मे
तन्हा और अकेला

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