शनिवार, 11 अप्रैल 2009

अनुगामी अन्नंत विचार

"अनुगामी अनंत विचार "तुमसा किनारा हू या अपना सा मंझधार बह रहा प्रवाह मे स्वयम ही क्या बन नाव और पतवार मै नही जानता कुछ भी शायद मेरा यह जन्म हो एक् लघु विराम प्रश्न एक् है अनुगामी अनंत विचार तुम कहते बहते जाओ लेकीन सागर करता हाहाकार पानी हवा माटी आग तुम सब मुझमे और इसलीये मै सबमे तुममे आकाश से दिखती धरती एक् सार इस बिंदु के वृत्त की परिधि के बाहर भी क्या मुझसा तुमसा बुझता -चमकता है कोई संसार जैसे दर्द की चांदी मे लिपटा जैसे कंचन सा हो प्यार .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: