शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

स्मरण

"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे













































"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे
















































"स्मरण "
पुल
घाट
और मन्दिर
के
दृश्यों को
नदी मे
झिलमिलाता हुवा तैरा -आया हू
मै
लौट आया हू
खोये हुवे
चेहरे की
जगह
उग आये
हरे -भरे
वृक्ष की -हरी पत्तीयों का स्पर्श
लीये
पत्थरो पर लेटे हुवे
मौन से
भला
मै
क्या पूछता
ढह चुके खंड -हरो मे
बीते हुवे कोलाहल को
कही पर
घायल
आदमी सा
अनदेखा कर
मै -
लौट आया हू
वहां
कांच के टुकडो
की तरह
फीकी
पड़
गयी
पुरानी धुप को
केवल
खोजता भर रह गया
पुराने से भी पुराने लग रहे
नए से -इस दर्द -को
छूकर
अपना
ही
घाव
हरा कर आया हू
चीर -निंद्रा मे लेटे
उस
संग-मरमरी देह
के
ऊपर
पंखुरियों सा
कुछ -कुछ
बिखर आया हू
और

इस्मरण मे
मित्र
के .............
अपनी आँखों के भीतर
अश्रूओ
सा
भरा -भरा ..रह आया हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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