गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

१३५-अनगिनत ,अनन्त सितारे

रेत पर
पद-चिन्ह
छोड़ जाओ
कुछ दूर चल लूंगा
लहरों को
अपना नाम -पता
बता जाओ
ईसी धरती मे रहता हू
तुम्हें
धुड लूँगा
छांव मे
बैठी रह गयी है
तुम्हारी परछाई
बैठ कर धुप सा
तुम्हें
निहार लूंगा
अनगिनत ,अनन्त सितारे
जड़े है
तेरे आचल मे
जल बनकर उसे
नदी सा बिछा लूँगा
तुम्हारे प्रतिबिम्ब
को तुम मानकर
तुम्हें
न देख पाने का दर्द भुला लूँगा
मालूम है
फूल बनकर
तुम्ही खिली हो
मंजिल हो मगर
राह मे मेरे
पग -डंडियों सा
तुम्ही आ मिली हो
तुम्हारी बांहों के
अ -दृश्य घेरे से
घिरा हुवा होकर भी
तलाशता हू
मै
अपने स-दृश्य
एक् चेहरा
तुम्हारा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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