बुधवार, 29 अप्रैल 2009

१३४-और मुझे कुछ कहना था

१-वहां कोई नही था
न भाई
न बहन
न माता -पिता
न ही कोई एक मित्र
सब अकेले थे
और मुझे कहना था कुछ
२-फेकी गयी जूठन मे से
किसी भिखारी को
मैंने
पेट भर खाना खाते देख लिया था
३-एक औरत को
नये कपड़े की तरह
खरीद कर
बाजार से जाते हुवे
मैंने
एक आदमी को
देख लिया था
४-रूप
या
धन
को पाकर
ख़ुद को बडा
सबको छोटा
समझने वाली नजर
को पढ़ लिया था मै
५- लोग नयी कार की तरह
दौड़ रहे थे
लिफ्ट की तरह चढ़ रहे थे
कांच के गिलास मे
नशे की तरह भर रहे थे
६-मुझे भी एक रंगीन चश्मा
खरीद लेना था
अब -तक
७-क्या भुलाना
लगातार लापरवाह
होते जाना
यही जिन्दगी है
८-
माँ
पिता
भाई
बहन
मित्र
पति या पत्नी
गुरु
ये सब केवल
क्या सीडियां है ?
९-क्या बुद्धीमान
वही व्यक्ति है
जो दुसरो को अपमानित
करना जानता है
१०-इन सारे प्रशनो के
उत्तर देने से बचने के लिए
लोग
जमीन खरीद रहे थे
नया घर बना रहे थे
या ख़ुद के गले मे
एक -मुखी
पंच-मुखी
रुद्राक्ष
के माले की तरह
लटक रहे थे

११-मै इस अंधेरे मे
दिए की तरह
जल रहा था
बस्
एकांत
सा
चुपचाप

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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