सोमवार, 13 अप्रैल 2009

११७-मन की आंतरिक यात्रा

मन की आंतरीक यात्रा१
-मन के गाँव मे
,शहर मे ,
मन्तव्य मे ,
मै ही सड़क ,
यात्राऔरगन्तव्यहोता
हूकिसी को पुकारतीबिछोह मे रोतीब्याकुल सी भावनाओं कीइसयात्रामेमै
कभी भिखारी केभूख साकराहता हूकभी आकर्षण के वियोग कोपल भर मेयुगों सासह जाताहू

कभी ज्योती के खातिरबाती सा जल कर विशुद्ध हो जाता हूफ़िर भी पानी के बाहर
निकली मेरी दो -चार उग्लिया तट को या तिनको को थामने की आखरी तक कोशिश करती ही है
और इस यात्रा मे मै इस तरह शेष रह जाता हू

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