शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

१२९-महानदी के उदगम स्थल सिहावा मे

१-सिढीयां ...
और मै ...
चढ़ते गये पहाड़
२-कुछ और
दूर -दूर
जाता दिया दिखाई
नीला ...
आकाश
३-हाथ मिलाने को
उत्सुक
वृक्षो की
टहनियों से

पत्ते ...
आते रहे
हरे -हरे
बार -बार ,
पास -पास
४-थके नही मेरे पाँव
फैलती गयी मेरी दोनों आँख
देख कर
महा नदी का
समीप ही
अर्ध-वृताकार विस्तार
५-नीचे दूर
रेखाओ सी सडको के
या
फीर स्केल -पट्टी सी मेडो
या
पग -डंडी -यो -के
किनारे
कतार -बद्ध
घरो से घिरा
दिखाई दिया गाँव
६-महा-नदी
के इस
उदगम -बिन्दु पर
बिखरे
तितर -बितर
जल -बूंदों मे
स्व-समाहित था
आत्म-विशवास
दर्द
हर्ष
समुद्र तक
पहुचने के लिए
पहले मै
पहले मै
का जोश
उछल -कूद
पारस्परिक -व्यवधान
७-मेने शीश नवाया
प्रणाम
श्रंगी -रिर्षी
के पास था -ज्ञान
एकाएक
एसे लगा
समुद्र तक पहुची
महा नदी
लौट आयी हो
मुहाने से
मुझे
सौपने अपना प्यार
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: