गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

१२७-प्रथ्वी को उठाकर

१-मेरी पत्नी ,बर्तन
फ़िर फर्नीचर
या पुरे घर को
उठा कर
रोज
रखती है
सही जगह पर
उसे पता है सब्जीयों के बारे मे
चांवल वह
ठीक पकते समय
गिला होने से पहले उतार लेती है
वह जानती है
मै इस समय
अख़बार पढ़ रहा होउंगा
धुप सीडिया ....
कब चढ़ती है
और सीढिया ...?
बरसात से फिसलती कब है
इतनासब वह जानती है
रद्धी का भाव -
पुराने कपड़ो के बदले
नये गिलास कितने मिलेंगे
२-वह पढ़ लेती है
मेरा उतरा हूवा -चेहरा
या
इन्द्रधनुष से छूटने को आतूर -
मेरी आँखों के तीर
बच्चो की नींद
धडी की तरह
वह भी नही थकती
वह समय से आगे है
सूरज की परीक्रमा
वो भी कर रही है
एक माँ
एक पत्नी
बेटी ,बहू
बनकर
उसे इतना व्यस्त देखकर
कभी -कभी
मुझे लगता है
घर को भर देने वाली उसकी
यह ममता
किसी
एक दिन
पृथ्वी को उठाकर
अपने घर की छत
पर न रख ले {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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