सोमवार, 13 अप्रैल 2009

११७-मन की आंतरिक यात्रा

३-हर बार
या
कितनी बार
फ़िर पढ़ता हू
जिसे ज्ञान कहते है
फ़िर भोगता हू
जिसे अज्ञान- कहते है
फ़िर लड़ता हू
जिसे न्याय कहते है
इस तरह
सरोवर के
हल -चल
मे
फैलाते जाते
वृत्त-जल
मे
एक -एक बूंद जीवन जीता हू
पल पल
मे ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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