मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

१२३-वर्तमान के विषय मे

{"वर्तमान के विषय मे "}

१-कवीता
लिखने मे
कितने ...
पन्ने लगे
कितनी उम्र
कितने दर्द ....
छने लगे
२-कई
जन्मो की
तपस्या ...
के बाद
जैसे
वो
मेरे अपने
लगने लगे

३-स्याही मिली
कलम मिला
कविता को
फ़ीर तुमसा
या
मुझसा
एक्
पारखी
दुड्ना पडा

४-आंसुवो के दर्पण
मे
तब
करूणा के अक्स
उभरने लगे

५-कोई
कितना भी
कहें ...
लिखा जा चुका है सब
पर
रोज
हर शख्स ...
वेदना की
नयी -नयी
किताबो
सा
छपने लगे

६-लिखने से
पहले
सबको ...
कितना रटू
या
खुद को
सार्थक पंक्तियों सा
कब
कैसे
रचू

७-वर्तमान के
विष
मे
अमृत सा ...
एक
बूंद-श्ब्द
मै ,तुम
या
हम दुड़ने लगे

८-कुवो के
प्यासे अधरों को
सूखी माटी मे धसे
अन -अंकुरीत बीजो को
यह
देकर आश्वासन की -
मुहाने से भी लौटा लायेंगे
पुरी ...
भागती नदी को

९-उग्गम से ही
अनाम
अथक
अन्तरंग
शाश्वत
प्रवाह के संग
मै
तुम
या हम सब
एक -एक
सजीव -तिनका
बन
बहने लगे ...
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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