शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

११९-रास्ते लौटने लगते है

raaste lautane lagate hai

जो भी मेरे पाठक है .मेरी कविताओं को पढ़ते है उन सबका मै आभारी हू ,-मेरी कविताओं मे चेतना के ,अचेतना के विभिन्न रंग होते है ...आशा है मै आपको इसी तरह से मानसिक यात्रा पर कविता द्वारा लेजाने मे सक्षम रहूंगा ...आप सबके स्नेह एवं विशवास के लीये शुक्रिया .........



रास्ते लौटने लगते है "
किसी
उपन्यास
के
सुखद अंत को
कोई
नही जी पाता
हर पल
कौरवो की भीड़ के साथ -
हमे
रौंदता हुवा
निकाल जाता है
सचमुच
सच के करीब
पहुचने से पहले
ही
रस्ते लौटने लगते है
सच
एक् जंगल की तरह है
जहां
टूटकर
गिरते हुवे किसी पत्ते की आवाज
साफ सुनायी देती है
जहां
उगता हवा
नन्हा
पौधा
सूरज को प्रणाम करते ही
यह जान जाता
है -की
इस
उजाले पर
सबका एक् सामान अधिकार है
सच
जंगल की एक्
अनाम पग -डंडी
की तरह है
जहा पर पहुंच कर
सारे आकार
निराकार हो जाते है
नाम ,न धर्म .....
यहाँ तक की मनुष्य
अपने कपडो की तरह
अपनी देह को
भी
उतार कर
मुक्त होने लगता है
सबसे वह प्रेम करने लगता है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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