रविवार, 12 अप्रैल 2009

११६-नये अक्षर ,नयी कवीता

३-नदी से कह दो
कि
वह
उसके रास्ते से हट जाए
उसका
तपा हवा मन
फ़ीर
कही पानी की तरह न बह जाए
उसे आने दो नदी के इस पार
सदीयों बीत गये
अब
उसकी आंच से सुलगने दो
जुटी हवी पत्तीयों को
और एक् बार
समूचा
जल जाने दो जंगल को
पत्थरों की हीरे -जडीत आँखों को
उसकी आँखों के तेज से टकरा कर
चूर -चूर हो जाने दो
मनुष्यता को पराजित करते आये
पत्थरों के आशीर्वाद को
धुंवा बनकर उड़ जाने दो
राख हो जाने दो
इस
सभ्यता को
समूल ढहने दो बरगद को
सुंदर दिख रहे
कीमती
सुरक्षित
सागौन के वृक्षो को
मत रोको उसे
वह
स्वयम ही एक् सही रास्ता है

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