सोमवार, 13 अप्रैल 2009

११८-तुम्हारी मुस्कराहट धुप की तरह

तुम्हारी मुस्कराहट
धुप की तरह
दिन -भर
मेरे साथ
रहती है
बिखरा -बिखरा
हवा की तरह
अब
नही घूमता
सडको पर
किसी पेड़ की छांह मे
तुम्हारे स्पर्श का
अहसास
होता है मुझे
सो रहे से
प्लेटफार्म मे
बैठा हुवा
मै
अक्सर
सुना करता हू
मिलो दूर से आती हुवी
उस
ट्रेन की आवाज
जिसमे तुम
बैठी हुवी
अनमनी सी
शायद
किताब के पन्ने
पलट रही होती हो
केवल एक नाम पुकारती सी
लगती है
नदी
और
मै
पहाड़ की चोटी
पर
अटके हुवे बादल सा
प्रति-उत्तर मे
तुम्हारे
नाम से
गूंज
जाया करता हू
रस्मो -रिवाजो से बनी
तुम्हारी देह तक
या संस्कारों के रंग से
पुते तुम्हारे
घर तक
पहुचना कठीन है
इसलिए
मैंने
मौन -व्रत ले रखा है
शायद प्यार
अंधा नही .......guunga
होता है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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