सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मन की आंतरिक यात्रा

चाहे वह सपना
या
जागरणहर समय
एकांत केअंतहीन घेरे से
बाहरकोई न कोईहरा -भरा वृक्षयापना सा लगता व्यक्तीमेरी तरफ
दौड़ताहुवा -मेर पास आना चाहता
है पर ठीक उसके छूते ही यथार्थ हो यासपनादोनों मे ही
मुझे घेरा हुवावहपार -दर्शी बुलबुला फुट जाया करता
हैजैसे hi मै संतुष्टी के साँसों को
लेना चाहता हून यथार्थ रहता न सपना
बस् रह जाता हूनवजात शिशु साफ़िर इस जग मेतन्हा और अकेला
३-हर बार याकितनी बारफ़िर पढ़ता हूजिसे ज्ञान कहते
हैफ़िर भोगता हूजिसे अज्ञान- कहते
हैफ़िर लड़ता हूजिसे न्याय कहते है
इस तरहसरोवर केहल -चल मे
फैलते जातेवृत्त-जलमेएक -एक बूंद जीवन
जीता हूपल पलमे ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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