रविवार, 12 अप्रैल 2009

११५-मै भी जी रहा हू

दीपक कहता
मै जल रहा हू
फूल कहता
मै खिल रहा हू
जल कहता मै बह रहा हू
रास्ता कहता मै चल रहा हू
मै भी
तो
कहता हू
जी रहा हू
चेतना के
सम्पूर्ण चित्रको
क्या
किसी ने देखा नही है
मैंने जब भी देखा
फल को
व्रक्ष पर लटके हुवे ....
क्या - जड़ ,तना .
pttiyaa
vhaan nhi hai ...?{kishor kumar khorendra }

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