शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१०७-प्यार के आठवे रंग से

जड़ो से लिपटा ,माटी सा -संग हू
हर तिनको के ,बड़े सपनो का -अंग हू
न लम्बी गली ,न महा नगर हू
न बड़े नाम सा -असर हू
सबमे एक सार प्रवाहित -सचेतन मन हू
प्यार के खातिर स्व -विसर्जित हुवा कई बार -वही तन हू
न स्वर्ण -रथ का पहिया
न सुरक्षित पहर हू
न इतिहास ,न कोई छल -अमर हू
प्यार के आठवे रंग से खिला हुवा -वर्तमान सुमन हू
पोखरों मे भरा हुवा ,बस मीठा जल हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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