शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

सुरक्षित रहे यह दुनिया

पग- डंडिया जहाँ पर थक-कर
आकर ठहरती है
शुरू होती हैं
वहाँ से मेरी कविता
मै एक वृक्ष की छाँव सा
पग -डंडियों से पूछता हू
उनका दर्द
हर मोड़ के प्रति
उनका आकर्षण
उनकी धूल को किस -किस ने
माथे पर
लगा कर किया यात्रा का शुभारम्भ
कौन चल नही पाया
क्या किसी की कामना पुरी हो गई ?
कर मन्दिर का दर्शन
लोगो से मिलते -मिलते
कईयों का हो गया होगा
हिरदय परिवर्तन
जब पग- डंडिया
लौटती है
उस पार पहाड़ के उतरती है
मेरी पत्तिया टूट -टूट कर दौड़- ती हुवी
उनका पीछा करती है
बदले मे लौट कर आए पंछियों से
भर जाता हू मै
और देखता रह जाता हू
तिनको का जमाव
घोसलों से अंडो का लगाव
कई बार मुझे लगने लगता है
चिडियों की जगह मै बैठा हू
अंडो को सेने के लिए
लेकिन
मुझसे टूट कर गिरे एक पत्ते की तरह
कभी न कभी कोई एक
नया बच्चा
घोसले से बाहर गिर ही जाता है .... मानो
मेरी हथेली से मै ही फिसल गया होऊ .....
तब
ऐसा लगता है मुझे ...मुझसे कोई अपराध हो गया हो
पता नही घोसले कोपछ-तावा हूवा या नही
मगर चिडियों की तरह
मेरी भी चीख निकल जाती है इसलिए
मै कर रहा हू आत्म समर्पण ......
क्योकि मेरा ,हर मनुष्य का -
यह दायित्व है
की
सुरक्षित रहे यह दुनिया {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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