शुक्रवार, 13 मार्च 2009

हर जन्म मे

>किसी न पढ़ी गयी किताब की तरह उसे खोजता हूँ पुस्तकालय या बाज़ार में या फिर पीपल की छान्व से पूछता हूँ वो- यहा आयी थी क्या कभी ...? कभी लगता है अभी -अभी -इसी ट्रेन में बैठ कर चली गयी ..वह हर बार ,हर समय ,हर जन्म में मुझे लगाता है -कुछ छूट रहा है मुझसे जैसे ....मेरे पहुँचने से ठीक पहले -कोई ले गया हो वह पेंटिंग जिसे -मै खरीदना चाहता हूँ खाली गिलास की तरह मैं प्यासा ही रह जाता हूँ वह पानी की तरह बहती हुवी मेरी पहुँच से -बहुत दूर निकल जाती है क्या मैं सिर्फ़ इंतज़ार करता हुवा तट हूँ ...और .... वह एक लौट कर -न आने वाली लहर यदि तुम ....मेरी आत्मा हो ..तो ..सच बतोओ ... कितनी बाहर हो और कितनी मेरे भीतर मैं तुम्हें इन उन्गलियो से छूना चाहता हूँ ..... या तुम ही पहचान लो मुझे .....मेरा कौन सा नाम ,रंग ,चेहरा पसंद है तुम्हें ? रूप बदलते ....बदलते .....थक चुका हूँ मैं .{किशोर कुमार खोरेंद्र }

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