मंगलवार, 10 मार्च 2009

मेरा कसूर यही है ...

मेरा कसूर यही है
मै नदी सा बहता हूवा सागर से जा मिला हू
मै रंग -रूप में फूलो सा खिला हू
मेरा धर्म ,ईमान से ,...जंगल से ज्यादा घना है
इसलिए मेरा चेहरा आज भी लापता है
मेरा पता ,पत्तो को ,पता है
मेरा गाँव वृच्छ की जडो के पास बसा है
मेरा नाम पूछ लो रेत से जो अभी अभी ...लहरों के हाथो हटा है
किसी को भी मेरे होने का भरोसा नही है
आज ही तो पुरा शहर जला है ......केवल राख बचा है
अख़बार में मेरा घर कुछ लपटों सा छपा है
मुझे बचाकर मगर ..अपने पास धुवो ने रखा है ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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