बुधवार, 4 मार्च 2009

औरत

औरत १...वः न दर्पण में समाई कोई मूर्ति ......कोख से उसे ...उतरने दो ..धरा की है वो खूबसूरती ../२-...दफ्तर में उसे टेबल न समझो ....घर में न है वो बेजान कुर्सी ......उम्र के हर मोड़ पर आ मिलती है ....ममताके जल से भरी हुवी जैसे हो वः एक बहती नदी /३-...स्पर्श से उसके ..पत्तियों में हरे रंग उभरते है ...उसके रूप ..तुलसी के आगे दिए से जलते है ..सिचने से जिसके पानी ..बेजान पौधे जी उठते है .....वो माँ है ..स्नेह के आंच से गर्म एक शाल ../४-मन जिसका मायका ...देह ससुराल .......भाई को देखे बिना ..बहना सी बेहाल ....वो औरत है मित्र जिसके तुम हो सवाल ...//{kishor kumar खोरेन्द्र }

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