मंगलवार, 10 मार्च 2009

नदी में जल बह रहा

नदी में जल बह रहा भीड़ में जैसे मै चल रहा
तट को जैसे ज्ञात नही घर को मेरी याद नही
प्रवाह सा अकुलाया कमीज के भीतर सकुचाया
नाम पूछता कोई नही राह धुन्ड़ता मुझे नही
फ़िर भी मै चलता हू चेहरों को सबके पढ़ता हू
कोई दुख -मय उससे पुछू कैसे क्यो घबराए से किस बात का भय
लगता तो ऐसा ही है तारो से तारो की पहचान नही है धुप दान कर दिया सूरज का बस् प्यार यही है छाह ओढाया पास बिठाया वृच्छो का इतना ही काम सही है
खम्बे से टिक जाऊ या चबूतरे पर बैठ जाऊ समीप आई चिडिया से मगर क्या कह पाऊ
चाहता मन तिनके सा चोंच में उसके फस जाऊ
ढुलकती जा रही पृथ्वी में और मुझमे फर्क कहा है
उसकी मेरी यात्रा का क्या अर्थ रहा है पूछता पत्थर से तू क्यो इतना पूजा जाता है सामने आदमी पड़ा उसे रौदा जाता है नदी में जल बह रहा भीड़ में वैसे मै चल रहा {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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