शुक्रवार, 20 मार्च 2009

खत्म नही होती शयद यात्रा भाग -२

दुसरो को क्या
स्वयम को भी पढ़ नही पाते
अपने नाम ,जाती ,धर्म के आलावा
एक औरत या पुरूष के अतिरिक्त
भी तो कुछ होता होगा
एक व्यक्ति ....?
मनुष्य का सच
मन की गहराई मे कछुवे की तरह छिपा रह जाता है
जलते दीपकों के बीच
अगरबत्ती सी सुलगती रह जाती है
इंसान की पवित्रता
शरीर खरगोश की तरह
दौड़ता हूवा पता नही
कहाँ
अदृश्य हो जाता है
और
शरीरी की कभी कछुवे की तरह
ख़त्म नही होती शायद यात्रा .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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