मंगलवार, 10 मार्च 2009

तुम सीधी साधी पगदंडी हो ...

१-तुम सीधी -साधी पगदंडी हो
पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर
पहुचकर देखना चाहती हो
स्वयम को -
हर मोड़ से मुड़ते हुवे
समुद्र की लहरों को
पेडो से गिरे नारियल को लेकर भागते हुवे
२-तुम-
संकरे पुल पर छा गये वृच्छो की टहनियों के बिच एक घोसले में बैठी ,बंद आखो वाली नन्ही चिडिया की तरह - प्यार से भरे दानो को चुगना चाहती हो चुपचाप
देखना चाहती हो
कान बंद कर सरपट उतरती हुवी रेल पटरियों को उन पुरुषों को जो उपर बर्थ पर लेटे हुवे पढ़ते है हर स्टेसन की समुद्र तल से उचाई मगर ,अनभिग्यरह जाते है जानने से निचे बैठी हुवी पत्नी के मन की गहराई ३-तुम - उदगम से ही नदी के साथ फ़िर से बहना चाहती ही जैसे कोई स्त्री , अलमारी में कपडो की जगह , अपनी काया को छोड़कर पुरुषों की भीड़ के शहर को लाँघ जाए एकदम से ,स्वतंत्र औरप्रकाश पुंज सी उड़ती जाए वासना रहित पवित्र ४-तुम सीधी साधी पगदंडी हो पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर पहुच कर यही देखना चाहती हो , न .... {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: