बुधवार, 4 मार्च 2009

आतंकित है आदमी ....

१-धुप की तरह आदमी भी ...मेरी पकड़ से बाहर है .....२- विस्फोट से वृक्षो की तरह उखड़े हुवे लोग ..सडको पर ..पुरे शहर की तरह बह रहे है ...३-आदमी ,आदमी में ड़ूब रहा है ...रास्ता आदमी के भीतर है या नही ...आतंकित है आदमी ..आदमी से पूछ रहा है ...४-और कोई एक मनुष्य लापरवाह पृथ्वी को ...दूर धकेलता हूवा -टूट कर गिरते हुवे ..सितारों की आंच से अपनी रोटी सेंक रहा है ....५-अजीब दृश्य है ..नीव खिसक रहे है fdfdate पंखो को घायल कबूतर देख रहे है ....ये कैसा धुंवा ..कैसी बौछार है ....६-हल निकल कर आता नही ...सवाल दर सवाल ...क्या बरसों तक चलने वाली तकरार है {kishor कुमार खोरेन्द्र }

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