शुक्रवार, 20 मार्च 2009

प्रतिक्रिया {"किसी न पढ़ी गयी पुस्तक की तरह "पर }

१-RaJiV sHaRMa:
धन्यबाद सर ....आप का हर शब्द मुझे छु जाता है .. २-----deepak:
वाह वाह ...........बहुत बढ़िया सर ॥ ३-VINOD BISSA:
जो सोचा पाया जग में पर ना पाया तुझसा दूजा ..... ४-VINOD BISSA:
शानदार रचना है किशोर जी ..... शुभकामनाएं..... ५-Girish:
अदभुतI liked it. -----६-Jenny:
वाह !!! बहुत खुबसूरत कविता है, मन की अभिलाषा और अतृप्ति की बात, बहुत खूब. -----७-Anita:
Dhanawad Kishor Ji...Shabnam Ji ko jaroor pasand aayega...Aap apni poems bhi wahan post kar sakte hain ... Aapki "Aurat" kavita bhi mujhay bahut pasand aayi thi...-मन जिसका मायका ...देह ससुराल ... bahut touching line hai ye... hum ladkiyan hi samajh sakti hain ki kitna dard chupa hai is pankti me... :(Keep it up!! Thanks!! Jai Sri Krishna!!

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