गुरुवार, 5 मार्च 2009

अध्यात्मिक मित्र

१-किस ग्रह से तुम ...पृथ्वी पर आई ......मै भी जन्मो से ..यात्री सा ढूंढ़ रहा .....अन्तरिक्ष में जसे साथी तुमसा कोई ...२-रूप रंग सुंदर ..आकार तुम्हारा .....क्या अमृत सा मीठा हो पायेगा ...मित्रवत ....प्यार हमारा ..३-यह केवल देह का आकर्षण नही है ....मधुर -मिलन से भी ऊँचा है आकाश हमारा .....३-दिल में जो लहरों का आमन्त्रण होता है .....वः देह -सरोवर की हलचल से ज्यादा ....विस्तृत और पावन होता है ...४- जैसे सिप में मोती सा ...वः हरदम छिपा..........५-...वः रहता ..".अचेतन मन की अतल गहराई में ....एक बूंद जल के भीतर हो जैसे किसी महानदी की बाढ़ सी अंगडाई में "{kishor कुमार }

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