गुरुवार, 5 मार्च 2009

अध्यात्मिक मित्र ....

-किस ग्रह से तुम इस पृथ्वी पर आई ..मई भी जन्म यात्री सा ढूंढ़ रहा .....अन्तरिक्ष में जैसे साथी इक सितारा तुमसा कोई ...-रूप रंग सुंदर ,आकर तुम्हारा ...काया अमृत सा मीठा हो पायेगा ..?.......मित्रवत यह प्यार हमारा .....-यह केवल देह का आकर्षण नही है ....मदुर -मिलन से भी ऊँचा है आकाश हमारा ....-दिल में जो लहरों का आमन्त्रण होता है ...वः देह -सरोवर की हलचल से ज्यादा ....विस्तृत और पावन होता है ....-अचेतन मन की गहराई मेन ....सिप में मोती सा छिपा ...jaजल

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