शुक्रवार, 20 मार्च 2009

९८-पारदर्शी कांच सा हो जाऊ तल्लीन

मै दर्पण सा
भीतर
सबका लिए प्रतिबिम्ब
सोचता जान गया
गहराई से हर झील /
अपनी दुनिया -अपना घर
सुख -दुःख से भरा
सबका अपना -अपना दिल /
कैसे निहारु अपना चेहरा
ठहरता नही आईने सा
मेरे सामने कोई आकर मिल /
अर्थ नही तो सब व्यर्थ है
रिश्ते -नातो की
पहचान मे
धन रहता क्यो शामिल /
तो क्या यही सत्य है
की मै
अपने ही बिम्ब और प्रतिबिम्ब के लिए
पारदर्शी कांच सा हो जाऊ तल्लीन । {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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