शनिवार, 7 मार्च 2009

शुरुवात कही से भी हो ...

...{. भाग १.}....१-मैंने प्रेम किया है .....डायरी के हर पन्ने में उसका नाम लिखा है .....खाली सीट पर वह बैठी है ,यह सोच कर -हर बस् ,हर ट्रेन ...में सफर करता रहा हू ......राह में उसके ,..उगने -वाली कठिना-इयो को जड़ सहित काटता रहा हू ......उसके स्पर्श को ..रुमाल में बांधकर रखता रहा हू .......--जब भी ट्रेन गुजरी ......पटरियों पर ... उसके जुड़े से गिरा एक मोंगरा दुन्ड़ता रहा हू ....../...2.........हां मैंने प्रेम किया है ...वो किताब अब भी मेरे पास है ...जिसकी कहानियों मे........उसके लिए .... मै ....नायक हूवा करता था .............एक पन्ने का कोना तुमने मोड़ दिया है ....मुझे लगता है ....आज भी उसके भीतर मुझे ..घूरती .......तुम्हारी दोनों आँखे बंद है ............वो कलम भी है मेरे पास जिसमे स्याही ........उसने अपने हाथो से भरी थी ...........{..शेष आगे }... .....--{भाग २}-----३-अब अक्सर .....पहाड़ पर एक चट्टान के पास जाकर ....लिखा हूवा मेरे बाजु में उसका नाम पढ़ लिया करता हू ...........अब अक्सर .....पेड़ की उस डाल पर जोअब बहुत ऊंचाई पर है .उसकी ..लिखी मिटती सी कवीता को रट लिया करता हू ........अब अक्सर जब भी वक्त मिलता है ....उसके शहर को अपनी गलियो की तरह घूम आया करता हू .........४---उस बहाने पत्थरों की जगह ...किसी इन्सान की ...पूजा कर लिया करता हू ...............५शुरुवात कही से भी हो .....प्रेम करना तो सीख ही गया हूँ .....हां मैंने भी प्रेम किया है ......{kishor कुमार खोरेन्द्र }

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