शुक्रवार, 27 मार्च 2009

१०३-अंत के अंत मे -

हाँ
यही सच है
किनारे टूटते रहे
पर किनारा रहेगा ही
लहरे आती रहे
पर उनका लौटना रहेगा ही
गिनते -गिनते लहरों को
लेकिन -
रेत की तरह बिछता हूवा तट
लहर न बन पायेगा /
उसके सीने पर
अपने माथे पर
सूरज की तरह
उभर आए बिन्दीयाँ के रंग को
बिखेर जायेगी -जरुर संध्या /
मुडती हवी देह सी
रेत पर लिखी यह कौन सी
भाषा है .....?
हवा नही बताएगी कभी
हाँ ,यही सच है -
समझ लो यही प्यार है /
खोजते रहो उसे
जैसे -एक पुरूष
एक औरत
तलाशते है एक दुसरे को
अभी ,इसी समय , या आजीवन
आदि से अंत तक यही होगा /
फ़िर
क्या अंत के अंत मे ......?
लहरे तटों मे समा जायेंगी
और वो तमाम बिछडे
हुवे -साथी मिलकर - बर्फ की तरह pighal जायेंगे
और tab प्रेम का सागर यह -नया
manushy के bhitar nso मे bhar jaayega
tab भी sdko पर लोग होंगे
पर प्रेम bhii होगा {kishor kumar khorendra }

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