मंगलवार, 3 मार्च 2009

नदी में जल बह रहा ...

१-नदी मे जल बह रहा .....भीड़ मे जैसे मै चल रहा .....तट को जैसे ज्ञात नही ...घर को मेरी याद नही ......./प्रवाह सा अकुलाया .....कमीज के भीतर सकुचाया .....नाम पूछता कोई नही ........राह दुन्ड़ता मुझे नही .../फ़ीर भी मै चलता हू....चेहरों को सबके पढ़ता हू .../कोई लगता दुःख मय पूंछू कैसे घबराए से क्यों ..किस बात का भय / २-लगता तो ऐसा ही है .....तारों से तारों की पहचान नहीं है ....धुप दान कर दिया ..सूरज का बस् प्यार यही है ...छाँह ओडाया , पास बिठाया ...वृच्छो का इतना ही काम सही है ...../खम्बे से टिक जाऊ या ...चबूतरे पर बैठ जाऊ ....समीप आई चिडिया से ...मगर क्या -क्या कह पाऊ ... चाहता मन तिनके सा ...उसके चोंच मे फंस जाऊ // ३-ढुलकती जा रही पृथ्वी और ....मुझमे क्या फर्क है ...शून्य मे उसकी और ...मेरी यात्रा का कहां अंत है /पूछता पत्थर से ..तू क्यों पूजा जाता है ...सामने आदमी बीमार पड़ा ...उसे रौंदा जाता है /कर अनदेखा ..भीड़ की बहती नदी को ..सरपट छूने चाँद ..क्यों पहुंच जाता है /....नदी मे जल बह रहा ....भीड़ मे जसे मै चल रहा {kishor कुमार }

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