शुक्रवार, 20 मार्च 2009

९७-कविता -अंश

वो भी दिन था
आज यही सोचती हू
उस रात मै सो गयी थी
पर सपनों से नाता तोड़ गयी थी
फ़िर बचपन को अधूरा ही
घर -आंगन मे छोड़ गयी थी
जैसे पर कटे पंछी सा
प्रथा द्वारा पिंजरे को सौप गयी थी
उमंगो से भरी मै थी एक कन्या
बचपन के सगाई के हाथो
क्या नही हुवी थी
मेरे अंकुरित -अरमानो की ....भ्रूण -हत्या .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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