मंगलवार, 10 मार्च 2009

विचार ...

१-एक ही विराट सत्ता है ...उसके हम अविभाज्य अंग है .२-चेतना बिन्दु मनुष्य ही है ...मनुष्य दर्पण ही तो है ३-मनुष्य प्रभु की भाषा है .४-काव्य एक गम्भीर सर्जनात्मक कर्म और सत्ता है जो समग्र उत्सर्गता चाहता है .५-सारी चरा-चरता एक महान काव्य है .५-कवी के पहले काव्य नही ,काव्य के उपादान थे .६-स्रष्टि रचना है ,और रचना काव्य होती है ,हम भी काव्य है ,क्योकि रचित है ७-सर्वथा जड़ कुछ भी नही है .८-मनुष्य कवी और काव्य दोनों है ,जबकि शेष ....केवल काव्य है .९-सृष्टि का अर्थ ही है -चेतना का प्रसार -अचेतन यहा कुछ भी नही है .{श्री नरेश मेहता }संकलन कर्ता -किशोर कुमार खोरेन्द्र ..

1 टिप्पणी:

नेपाल हिन्दी सहित्य परिषद ने कहा…

मै मुढ, ईन 5 ज्ञानेन्द्रिय को हीं अंतिम सच्चाई मान बैठा था। अब उन्ही ज्ञानेन्द्रिय जनित ज्ञान के स्तर पर अनुमान लगा लिया है कोई चिरंतन शास्वत चेतन तत्व है। तत्त्वमसि। लेकिन जब तक कर्मबन्धन नही छुटेगा। जब तक पुर्व संचित सारे कर्म बीज नष्ट न होंगे तब तक अनुभुति के स्तर पर प्रमाणिक रुप से उस चेतन तत्व से साक्षात्कार कहां होगा। मै ढुंढ रहा हुं वह मार्ग जो वहां तक पहुंचा दे। प्रस्थान का मार्ग? ........