शुक्रवार, 13 मार्च 2009

अमृत मे घुल जावो

मेरी जेब में पर्स कि जगह झील है ,तालाब है . और मेरी नस-नस में समुद्र ! नमक कि तरह भरा हुवा है मैं कहता हूँ तुमसे - हा मैं पानी हूँ --तुम भी मुझे भर लो --ख़ुद में ....एक काँच के गिलास कि तरह .चिलचिलाती धूप में सड़कों पर बहती हुवी तृष्णा कि नदी न्ही हूँ मैं मैं प्रेम कि तरह तरल हूँ .........तुम भी आ जाओ .....इस पृथ्वी के अमृत में घुल जाओ /{किशोर कुमार खोरेंद्र

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