गुरुवार, 12 मार्च 2009

मुझे तो आदत है ...

वृक्ष से कया कहूँ वह कहता ही नही और नदी है की सुनती नही मैं लौट कर फिर pgdndiyo से होता हुवा तुम्हारे पास आता हूँ जहा न जंगल है न नदिया केवल रुके हुवे पत्थरों कि तरह ठहरें हुवे शब्द है या टूटे हुवे आईने में बिखरे हुवे अनंत चेहरे जिन्हें चाह कर भी छूना मना है शीशे में कैद इन तमाम चेहरों के पास प्रश्न है केवल ......... उन्हें भी परछाई से बाहर आना है लेकिन डर है कहीं काँच टूट -कर कहने लगे फिर ...... मुझे तो आदात है ...चेहरो को कैद करने की .....{kishor kumar khorendra }

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