बुधवार, 11 मार्च 2009

प्रतिक्रियाये

होली पर ...रंगो से चेहरे पुतेअपना कौन ,पहचाने किसेकिस पर , सोचता मन मर मिटेहर व्यक्ति बिछा -बिछा सा -लगाना चाहता गले , भूल कर शिकवे गिलेआदमी के भीतर ,शहर ,अपना लग रहा हैभुला कर आज हादसों के सिलसिलेबच्चो के मन , पलाश से खिले -खिलेस्नेह की बौछार होती रहे सदैव ...एकता का रंग लिए -लिए{किशोर कुमार खोरेन्द्र } .....мєєиα:
shukriya .. apke kavithayein toh ati sundar hai g :)apko bhi holi mubarak :).......Guman Bhushan:
आपकी कविता वाकई में बहुत अच्छी लगी . जिस तरह के होली के माहोल का aapne वर्णन किया है वोह १ आदर्श माहोल है.....इस तरह ke माहोल का एहसास अगर हर किसी हो जाए, तो दुनिया स्वर्ग सी नज़र आये.. .................Mangala:
सुप्रभात! बहोत खूब लिखा है होलीके रंग देखे ,अब पहचाने खुदका अंतरंग ! उसके है गहरे रंग ,वो न बदलते है ,उत्पत्ति, स्थिति और लयके संग! ये तो खेल है मायाका,न गुम हो जाना उसके संग!...शुभदिन!

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