गुरुवार, 5 मार्च 2009

पिकनिक में

तुम्हारी देह से भींग गया जल ..........तुम्हारी हंसी में गूंज रही हो नदी की कल -कल ...........अपनी पीठ पर बिठा कर तुम्हे ,हिल गया ,कुछ ,पथरीला मन ..........फूल पूछ रहे हो आपस में ,किसका है यह हमसे सुंदर तन .........मित्र खुशिया ,मुस्कुराहटो की तरह -धुप सी फ़ैल ही जाती है .........और झूम उठते है ,-"प्रेम के अंकुरित बिज -कण"[kishor कुमार खोरेन्द्र }

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