बुधवार, 4 मार्च 2009

किल पर

अन्नत से अन्नत तक .....इस यात्रा में ......वः भूख और रोटी के बिच ...अपने विचरो की किल पर ....भूख से झुका हूवा .....रोटी की परिक्रमा करता है ....पृथ्वी की तरह ....सघन वन में सूर्य को ...धुप की तरह छांह में बैठा देखता है ..एकांत में ..चिलचिलाता हूवा ...उसकी तनिबन्द मुठ्ठियों में ..न धुप है न ...आचमन के लिए भरा जल ही ठहर पाया है ....आरती के जलते दियो के समक्ष ........आशीर्वाद के लिए झुका हूवा सिर ....क्या hinshk tlvaro की var shne के लिए ही है {kishor kumar khorendra }

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