मंगलवार, 3 मार्च 2009

औरत

१-वः न कपडा है न जूती...वः न दर्पण में समाई कोई मूर्ति ......कोख से उसे ...उतरने दो ..धरा की है वो खूबसूरती ../२-...दफ्तर में उसे टेबल न समझो ....घर में न है वो बेजान कुर्सी ......उम्र के हर मोड़ पर आ मिलती है ....ममताके जल से भरी हुवी जैसे हो वः एक बहती नदी /३-...स्पर्श से उसके ..पत्तियों में हरे रंग उभरते है ...उसके rup ..तुलसी के आगे दिए से जलते है ..सिचने से जिसके पानी ..बेजान पौधे जी उठते है .....वो माँ है ..स्नेह के आंच से गर्म एक गोरशी../४-mn जिसका mayka ...deh ssural .......भाई को देखे बिना ..bhna si behal ....वो औरत है मित्र जिसके तुम हो sval ...जुड़े tk ही mt rkho उसे simit .....jhulti rngin ..dorsi ....//{kishor kumar khorendra }

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